कोरोना आपदा नहीं अवसर
कोरोना का कहर पूरे भारत पर देखने को मिला। हजारों बच्चों ने अपने मां-बाप को खो दिया ।श्मशान ,कब्रिस्तान लोगों से भर गया। किसी को तो सड़क पर फेंक दिया गया जिन का अंतिम संस्कार वहां की पुलिस वालों ने कराया ।बीते 1 महीने मे स्थिति भयावह हो गई लेकिन सबके घर वालों का एक सा आरोप है कि उनके पीड़ितों का इलाज सही से नहीं हो पाया। कोरोना मरीजों के परिजनों का कहना है उनके पीड़ितों का इलाज बहुत ही लापरवाही से हुआ ।ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए कई अस्पतालों ने अपने फीस को बढ़ा दिया मेडिकल चार्जेस मनमानी ढंग से लगाया गया ।सिर्फ 2 से 3 दिन में उनके पीड़ितों को इतनी दवाएं चढ़ाई गई कि जितना कि अगर फेफड़े की बीमारी वाले मरीजों को चढ़ाई जाए तो वह मर जाएगा ।सिर्फ 2 से 3 दिन मे डॉक्टरों ने लोगों से लाखों रुपए वसूल किए ।अगर यह मर्ज महामारी है तो क्या महामारी के इलाज में इतना रुपए लगना सही है ।पीड़ितों को भर्ती कोरोना के नाम पर किया जा रहा है लेकिन मृत्यु के बाद उनका डेथ सर्टिफिकेट पर दूसरे फेफड़े की बीमारी दिखा दिखाया जा रहा है ।जब उनसे परिजन बहस कर रहे हैं तो वह कह रहे हैं की सीटी स्कैन एंटीजन प्राइवेट का मान्य नहीं है। यानी जिन परिजनों को सरकार की तरफ से कोरोना पीड़ितों को लाभ दिया जाएगा वह लाभ नहीं ले पाएंगे क्योंकि उनकी मृत्यु प्रमाण पत्र में यह लिखा ही नहीं गया कि वह कोरोना से मरे हैं। आखिर सरकार इस पर क्यों कुछ नहीं बोल रही है क्या यह विषय गंभीर और सोचनीय नहीं है ।क्या इससे भारत के लोगों पर या उससे जुड़े लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता ।क्या जिन लोगों ने अपना मां बाप कोरोना जैसी महामारी की वजह से खोया क्या वह इसके मुआवजे के हकदार नहीं है ।मृत्यु प्रमाण पत्र में क्यों डॉक्टर कोरोना दिखाने में इतना डर रहा है जबकि उसने भर्ती इसी आधार पर किया था और इसी आधार को मान करके उसने दवाइयां भी चलाई थी।